जिसे जनता ने दिया आशीर्वाद, उसके लिए ऐसी भाषा? अपने मुद्दे उठाएं, BJP को गाली देकर क्या हासिल करेंगे नसीरुद्दीन शाह?

भारत में लोकतंत्र है. यहां चुनाव में जनता तय करती है कि शासन कौन करेगा. देश के करोड़ों लोगों ने वोट देकर बीजेपी को पहले देश की सत्ता सौंपी फिर बंगाल में भी सत्ता परिवर्तन भी जनता ने ही किया. लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सबको है. सवाल पूछना भी जरूरी है. सरकार की आलोचना करना भी किसी नागरिक का अधिकार है. लेकिन सवाल यह है कि क्या अपनी बात रखने के लिए अपमानजनक भाषा ही सबसे सही रास्ता है? शायद नसीरुद्दीन शाह को अपमानजनक भाषा और सवाल में अंतर नहीं पता. अगर ऐसा होता तो शायद फिर वह ये गलती नहीं करते.
दरअसल, नसीरुद्दीन शाह ने एक वीडियो में बीजेपी को लेकर तीखी टिप्पणी की. उन्होंने पार्टी को ‘झूठी’ बताया. साथ ही आरोप लगाया कि जो लोग उसकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, उनसे बदला लिया जा रहा है. उन्होंने सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के छात्रों का मुद्दा भी उठाया. मुद्दा उठाना गलत नहीं है. अगर छात्रों के साथ अन्याय हुआ है तो उसकी जांच होनी चाहिए. जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. लेकिन जब किसी राजनीतिक दल के लिए ऐसी भाषा इस्तेमाल होती है, जिसे करोड़ों लोगों ने वोट देकर सत्ता तक पहुंचाया है, तब बहस मुद्दों से हटकर शब्दों पर आ जाती है.
